अन्य सरकारी बैंकों की तु ना में देश के ग्रामीण आर्थिक विकास में अग्रणी
स्टेट बैंक ऑफ इंदौर अस्तित्व की लड़ाई भाग -2
मुद्दा : स्टेट बैंक ऑफ इंदौर का एसबीआई में विलय
मनीष उपाध्याय
इंदौर। अपनी पितृ बैंक की जिंद के चलते उसमें विलय को बाध्य की जा रही स्टेट बैंक ऑफ इंदौर का देश के ग्रामीण क्षेत्रों के आर्थिक विकास में योगदान किसी भी अन्य निजी या सर्वाजनिक क्षेत्र के व्यावसायिक बैंकों की तु ना में सर्वेपरि है। अगर इंदौर बैंक का एसबीआई में विलय किया जाता है तो यह देश के आर्थिक विकास के साथ खिलवाड़ ही माना जाएगा।स्टेट बैंक ऑफ इंदौर की मध्य देश में जड़ें अन्य किसी भी बैंक की तुलना में कितनी गहरी है, इसका अंदाजा इस तथ्य से गाया जा सकता है कि देश में व्यावसायिक बैंकों की कु शाखाओं में 80 प्रतिशत हिस्सा स्टेट बैंक ऑफ इंदौर का है। बैंक का 60 तिशत कारोबार सिर्फ मध्य देश में ही है। स्टेट बैंक ऑफ इंदौर का प्राथमिकता क्षेत्र को अग्रिम ( प्रिओरिटी सेक्टर एडवांसेस) केव मध्य देश केि त है। 31 मार्च 2009 तक बैंक की ग्रा्रमीण शाखाओं का साख जमा अनुपात (क्रेडिट डिपॉजिट रेशो) 108 प्रतिशत था, जबकि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और अन्य सार्वजनिक क्षेत्र की व्यावसायिक बैंकों के संदर्भ में यह आँकड़ा करीब 75 से 80 प्रतिशत है। अर्थात ग्रामीण क्षेत्रों में जमा हुए 100 रु। के बदले में स्टेट बैंक ऑफ इंदौर ने ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने के लिए 108 रु. लगा है। उक्त तथ्य यह बताने को काफी है कि स्टेट बैंक इंदौर ने अपनी उस भूमिका का निर्वाहन पूरी जिम्मेदारी के साथ किया है, जिसके लिया उसे 1959 में सार्वजनिक क्षेत्र की बैंक के रुप में गठित किया गया था। साथ ही उपरोक्त आँकड़ें यह भी दर्शाते है कि सार्वजनिक क्षेत्र के अन्य बैंकों की तु ना में स्टेट बैंक ऑफ इंदौर ही एकमात्र बैंक है जो देश के आर्थिक खासकर ग्रामीण क्षेत्र के आर्थिक विकास की चिंता रखता है। सवा यह उठता है कि क्षेत्र में बड़ा और ाकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण होने के बावजूद अभी तक विकास के पैमानों पर देश के अन्य राज्यों की तु ना में पिछड़े मध्य देश से उसके अग्रणी बैंक स्टेट ऑफ इंदौर का स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में विलय कर उसकी पहचान खत्म कर देना देश के आर्थिक खासकर ग्रामीण आर्थिक विकास की मुख जड़ को समाप्त करना नहीं होगा ?
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