Saturday, November 28, 2009

स्टेट बैंक ऑफ इंदौर का स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में विलय का मुद्दा : संसद की अवमानना

स्टेट बैंक ऑफ इंदौरअस्तित्व की लड़ाई भाग- १
मनीष उपाध्याय

इंदौर मध्य देश के आर्थिक वैभव और तरक्की की पहचान स्टेट बैंक इंदौर के निदेशक मंड द्वारा 19 जून 2009 को बैंक को अपनी पितृ संस्था भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) में वि य के स्ताव को तुरत-फुरत मंजूरी दिए जाने ने कई यक्ष श्नों को पैदा किया है। मध्य देश के सार्वजनिक क्षेत्र के इस सिरमौर बैंक के वि य को ेकर जो शीघ्रता दिखाई जा रही है, उसमें कई कानूनी, संवैधानिक, ासंगिकता, क्षेत्रीय भावना और अतीत के कटु अनुभवों जैसे तथ्यों की अनदेखी की जा रही है। नईदुनिया इन्हीं मुद्दों के औचित्य को श्रन्द्क्ला के रुप में अपने सुधि पाठकों को स्तुत कर रहा है।
1995 में राष्ट्रीय ग्रामीण साख सर्वे ने इस तथ्य को जोरदार तरीके से रखा था कि देश के ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सिस्टम का विस्तार किए जाने की सख्त आवश्यकता है, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाया जा सके। इसी तथ्य का परिपा न करते हुए स्टेट बैंक ऑफ इंडिया अधिनियम 1955 के जरिए तत्कालीन इंपिरिय बैंक ऑफ इंडिया को बद कर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बनाया गया था। इसे ग्रामीण क्षेत्रों में तीव्र विस्तार कर कर्ज मुहैया कराने की महती जिम्मेदारी सौंपी गई थी ताकि ग्रामीण साहूकारों के चंगु से मुक्त हो सके। बहरहा क्षेत्रीय असंतु न के कारण एसबीआई इस दायित्व का सही तरीके से निर्वहन करने में असफ रहा। फ स्वरुप 1959 में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (सबसिडरी बैंक्स) एक्ट 1959 को संसद में पारित कराकर तत्कि न राजपरिवार के अधिनस्थ 7 क्षेत्रीय बैंकों को एसबीआई का अनुषंगी बैंकें-स्टेट बैंक ऑफ इंदौर, स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद, स्टेट बैंक ऑफ पटियाला , स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर, स्टेट बैंक ऑफ त्रावणकोर, स्टेट बैंक ऑफ मैसूर और स्टेट बैंक ऑफ सौराष्ट्र बनाया गया। गौर करने की बात यह है कि यह सहायक बैंकें एसबीआई की महज अनुषंगी कंपनियाँ नहीं है, जिन्हें कंपनिस एक्ट के तहत अनुषंगी बनाया गया हो, बल्कि इन्हें संसद के द्वारा पारित स्ताव के आधार पर अनुषंगी बनाया गया है। जब उस वक्त इन्हें अनुषंगी के रुप में अंगीकार किया गया था, तब आज संसद को परे रखकर इनका वि य क्यों किया जा रहा है? जो संस्था संसद द्वारा असतित्व में आई है, उसका भविष्य भी संसद के द्वारा निर्धारित क्यों नहीं कराया जा रहा है? स्टेट बैंक ऑफ सौराष्ट्र के माम े में भी संसद से मंजूरी नहीं दिलाकर महज मंत्रिमंडल की मंजूरी के द्वारा विलय को स्वीकार कर लिया गया। सरकार का और एसबीआई के यह कदम संसद की अवमानना नहीं है तो क्या है?

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